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बंगाल से तमिलनाडु तक BJP बनाम विपक्ष की बड़ी सियासी जंग, 2026 का साल विपक्ष के लिए कितना होगा कारगर?

2026 के विधानसभा चुनावों को लेकर देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है, जहां विपक्ष खुद को मजबूत स्थिति में मान रहा है. बीजेपी ने संगठनात्मक बदलाव, दक्षिण भारत पर फोकस और गठबंधन विस्तार के जरिए बढ़त बनाने की रणनीति अपनाई है. केरल, तमिलनाडु और बंगाल की लड़ाई 2029 की राजनीति की दिशा तय करने में अहम साबित हो सकती है.

Assembly Election 2026: साल 2026 भारतीय राजनीति के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है. अगर विपक्ष सही रणनीति अपनाता है, तो यह साल उसके लिए बड़ा मौका बन सकता है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस हो या तमिलनाडु में एमके स्टालिन की DMK, कई राज्यों में विपक्ष मजबूत स्थिति में दिख रहा है. वहीं दूसरी ओर, बीजेपी भी कोई कसर छोड़ने के मूड में नहीं है और उसने साल की शुरुआत से ही आक्रामक राजनीतिक चालें चलनी शुरू कर दी हैं.

बंगाल, तमिलनाडु और केरल में विपक्ष की मजबूत पकड़

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी साफ कर चुकी हैं कि वह आने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी को खुला मैदान नहीं देने वालीं. तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की पकड़ अब भी मजबूत मानी जा रही है. केरल में कांग्रेस की स्थिति भी बेहतर दिख रही है और वहां CPI(M) के लिए सत्ता बचाए रखना आसान नहीं होगा. हालांकि, असम में बीजेपी के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के सामने कांग्रेस के लिए राह काफी मुश्किल नजर आती है. राजनीति में अनिश्चितता हमेशा बनी रहती है, लेकिन फिलहाल तस्वीर यही संकेत देती है.

नए साल की शुरुआत में बीजेपी को मिली बड़ी बढ़त

साल की शुरुआत बीजेपी के लिए अच्छी रही. पार्टी ने सहयोगी एकनाथ शिंदे के साथ मिलकर देश की सबसे अमीर नगर निगम, बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) पर कब्जा जमाया. इसके अलावा महाराष्ट्र के कई नगर निकायों में भी बीजेपी ने जीत दर्ज की, जिसमें पुणे जैसे क्षेत्र शामिल हैं, जिसे लंबे समय से पवार परिवार का गढ़ माना जाता रहा है.

नितिन नबीन बने BJP के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष

इन जीतों के बाद बीजेपी ने नितिन नबीन को अपना नया राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया. 45 वर्षीय नबीन बिहार से पांच बार विधायक रह चुके हैं और बीजेपी के इतिहास में सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं. उनकी नियुक्ति को पार्टी संगठन को प्राथमिकता देने और RSS की सोच के अनुरूप कदम माना जा रहा है, हालांकि नेतृत्व पार्टी के शीर्ष दो नेताओं के हाथ में ही रहेगा.

बीजेपी ने नबीन की ताजपोशी को बड़े पैमाने पर प्रचारित किया. प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और पार्टी संगठन पूरी ताकत से इस मौके पर जुटा. कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस अगर मल्लिकार्जुन खड़गे के अध्यक्ष बनने पर ऐसा ही संदेश देती, तो दलित समुदाय तक एक मजबूत संकेत जाता.

दक्षिण भारत पर PM मोदी का खास फोकस

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना ध्यान दक्षिण भारत की ओर मोड़ा, जहां अप्रैल में केरल और तमिलनाडु में चुनाव होने हैं. इन दोनों राज्यों में बीजेपी अभी बड़ी ताकत नहीं है, लेकिन केरल में हालिया स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी ने अहम बढ़त बनाई है. खासतौर पर तिरुवनंतपुरम नगर निगम में बीजेपी की जीत ने सभी को चौंका दिया.

स्थानीय चुनावों में कांग्रेस को करीब 29% वोट मिले, CPI(M) को 27% और बीजेपी को लगभग 14.7% वोट हासिल हुए. इस प्रदर्शन से उत्साहित होकर पीएम मोदी ने तिरुवनंतपुरम में जोरदार रोड शो किया, जो कांग्रेस नेता शशि थरूर का लोकसभा क्षेत्र भी है. मोदी ने इस जीत की तुलना 1987 के अहमदाबाद नगर निगम चुनाव से की, जिसने गुजरात में बीजेपी के उभार की नींव रखी थी.

पद्म विभूषण और केरल की राजनीति

गणतंत्र दिवस से पहले केंद्र सरकार ने केरल के पूर्व मुख्यमंत्री और CPI(M) के दिग्गज नेता वीएस अच्युतानंदन को मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया. इस फैसले को भी केरल की राजनीति में एक खास संदेश के तौर पर देखा जा रहा है और इस पर राज्य में जमकर चर्चा हो रही है.

तमिलनाडु में NDA को मजबूत करने की कोशिश

केरल के बाद पीएम मोदी तमिलनाडु पहुंचे. यहां उन्होंने DMK पर भ्रष्टाचार, माफिया राज, अपराध और परिवारवाद के आरोप लगाए और साथ ही NDA गठबंधन को विस्तार दिया. AIADMK, PMK और कुछ छोटे दलों के अलावा अब AMMK प्रमुख टीटीवी दिनाकरन भी NDA में शामिल हो गए हैं. इससे NDA को थेवर समुदाय में मजबूती मिलने की उम्मीद है.

पूर्व प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष के अन्नामलाई, जिन्होंने राज्य में पार्टी को चर्चा में लाया था, अब फिर से सक्रिय भूमिका में दिख रहे हैं. हालांकि बीजेपी और AIADMK के बीच सत्ता साझेदारी को लेकर अब भी सहमति नहीं बन पाई है, क्योंकि तमिलनाडु की राजनीति में सहयोगी दलों को सरकार में हिस्सेदारी देना आम चलन नहीं है.

शशि थरूर और कांग्रेस की दुविधा

केरल में कांग्रेस के लिए शशि थरूर एक अहम लेकिन चुनौतीपूर्ण चेहरा बने हुए हैं। पार्टी नेतृत्व उन्हें लेकर असमंजस में दिखता है. 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF ने केरल की 20 में से 18 सीटें जीती थीं, जिससे पार्टी का आत्मविश्वास बढ़ा है.

हालांकि हालिया घटनाओं, खासकर कोच्चि में राहुल गांधी द्वारा थरूर को नजरअंदाज किए जाने और दिल्ली की अहम बैठक से थरूर की गैरहाजिरी ने अंदरूनी मतभेदों को उजागर कर दिया है. इस तरह के विवाद कांग्रेस की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं और इसका फायदा LDF और BJP को मिल सकता है.

2027 और 2029 की बड़ी तैयारी

बीजेपी की रणनीति साफ है—केरल में अपनी पकड़ बढ़ाना और कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकना, भले ही इसके लिए वाम मोर्चा सत्ता में बना रहे. पार्टी जानती है कि 2026 के चुनावों का मनोवैज्ञानिक असर विपक्ष को मजबूत कर सकता है. यही वजह है कि बीजेपी 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश, गुजरात और पंजाब के चुनावों से पहले कोई जोखिम नहीं लेना चाहती, क्योंकि यही मुकाबले 2029 की बड़ी राजनीतिक लड़ाई की दिशा तय करेंगे.

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